
थपलियालखेड़ा में वन विभाग की जागरूकता गोष्ठी
(हिम उत्तराखंड न्यूज ब्यूरो)
वनाग्नि व मानव-वन्यजीव संघर्ष पर दी जानकारी
हल्द्वानी। प्रभागीय वनाधिकारी हल्द्वानी वन प्रभाग एवं उपप्रभागीय वनाधिकारी शारदा उपवन प्रभाग के निर्देशन में वनक्षेत्राधिकारी सुनील शर्मा द्वारा भारत-नेपाल सीमा से सटे सीमांत गांव थपलियालखेड़ा में वनाग्नि सुरक्षा, मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम तथा स्थानीय जन समस्याओं के समाधान के उद्देश्य से जन-जागरूकता एवं संवाद गोष्ठी का आयोजन किया गया।कार्यक्रम का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्र के ग्रामीणों को वनाग्नि से बचाव, वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व तथा वन संरक्षण के प्रति जागरूक करना रहा। वन विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों की उपस्थिति में आयोजित इस गोष्ठी में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने भाग लिया।बैठक के दौरान वन कर्मियों ने ग्रामीणों को वनाग्नि के कारणों, उससे होने वाले पर्यावरणीय और आर्थिक नुकसान तथा रोकथाम के उपायों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गर्मियों के मौसम में छोटी-सी लापरवाही भी बड़े स्तर पर आग का रूप ले सकती है, जिससे वन संपदा, वन्यजीवों और पर्यावरण को भारी नुकसान होता है। ग्रामीणों से अपील की गई कि वे जंगल में जलती बीड़ी-सिगरेट न फेंकें, सूखी घास या पत्तियों में आग न लगाएं तथा कहीं भी आग लगने की स्थिति में तुरंत वन विभाग को सूचना दें।इसके साथ ही ग्रामीणों को वनाग्नि नियंत्रण में सामुदायिक भागीदारी की महत्ता भी समझाई गई। बैठक में मानव-वन्यजीव संघर्ष के विषय पर भी विस्तार से चर्चा की गई। ग्रामीणों को रात्रि के समय अकेले जंगल या खेतों में न जाने, खेतों के आसपास रोशनी की व्यवस्था रखने तथा वन्यजीव दिखाई देने पर तत्काल वन विभाग को सूचना देने की सलाह दी गई।गोष्ठी के बाद वनक्षेत्राधिकारी सुनील शर्मा ने अपनी टीम के साथ आसपास के वन क्षेत्र और गांव का स्थलीय निरीक्षण भी किया। इस दौरान ग्रामीणों द्वारा उठाई गई विभिन्न समस्याओं को मौके पर सुना गया तथा कई समस्याओं का तत्काल समाधान भी किया गया। ग्रामीणों ने वन विभाग के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार की बैठकों से विभाग और जनता के बीच संवाद मजबूत होता है और समस्याओं का समाधान शीघ्र संभव हो पाता है।कार्यक्रम में वन दरोगा मुनेश सिंह राणा, पुष्पेंद्र सिंह राणा सहित स्थानीय ग्रामवासी उपस्थित रहे। यह आयोजन सीमावर्ती क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक सहभागिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।



